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India - UP assembly Elections 2017: बीजेपी को हराएं और लोकतंत्र को बचाएं: उत्तर प्रदेश के मतदाताओं से अपील

14 February

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sacw.net - 14 February 2017

बीजेपी को हराएं और लोकतंत्र को बचाएं: उत्तर प्रदेश के मतदाताओं से अपील

(पीपुल्स अलायंस फॉर डेमाक्रेसी एंड सेकुलरिज्म)

फरवरी 2017 में उत्तर प्रदेश के मतदाता अपनी अगली राज्य सरकार का चुनाव करेंगे. उत्तर प्रदेश हिन्दुस्तान का सबसे बड़ा राज्य है. हर पांचवां भारतीय यहां बसता है. यहां के नागरिकों का राजनीतिक चुनाव न सिर्फ राज्य की राजनीति की दिशा तय करता है, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति पर भी असर डालता है. इस बार का चुनाव पहले से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है. यूपी के मतदाता न सिर्फ राज्य सरकार को चुनने वाले हैं, बल्कि वे कई मायनों में भारतीय लोकतंत्र के भविष्य का भी फैसला करेंगे. इसलिए, उन पर एक खास जिम्मेदारी है कि वे अपने मत का अत्यधिक ध्यान और विवेक के साथ इस्तेमाल करें.

2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 40 फीसदी से ज्यादा मत मिले थे और उसे 80 में से 71 सीटों पर जीत हासिल हुई थी. इस जबरदस्त सफलता के पीछे कई वजहें थीं- यूपीए सरकार का राजनीतिक दिवालियापन, यूपी में गैर-बीजेपी मतों का तीन-तरफा विभाजन, धार्मिक अल्पसंख्यकों पर निरंतर हमला और साम्प्रदायिक हिंसा. इसका सबसे निंदनीय उदाहरण मुजफ्फरनगर का दंगा था. इसके साथ-साथ जनता का एक हिस्सा बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी के अच्छे दिन के वादे में भी फंस गया.

मोदी सरकार के ढाई सालों ने यह दिखा दिया है कि रोजगार, विकास और सामाजिक शांति के वादे सिर्फ चुनावी जुमला थे. यह सरकार जनता को सुरक्षा मुहैया कराने की बुनियादी जिम्मेदारी तक को निभाने में असफल रही है. संघ परिवार के हिंसक साम्प्रदायिक तत्वों ने इस जीत को देश के अलग-अलग हिस्सों में धार्मिक अल्पसंख्यकों और दलित समुदायों पर हमला करने के एक मौके के तौर पर लिया.

दिल्ली से बमुश्किल 50 किलोमीटर दूर बधाना गांव के मोहम्मद अख़लाक़ को उनके ही गांव के तथाकथित गौ-रक्षकों द्वारा मार दिया गया. गुजरात के उना में खुद को हिंदुओं का रक्षक मानने वाले हिंसक गुंडों ने दलितों को सार्वजनिक रूप से बेइज्जत किया. जब हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय के छात्र रोहित वेमूला ने विश्वविद्यालय के अधिकारियों के शोषण से तंग आकर आत्महत्या कर ली, तो आरएसएस के छात्र संगठन एबीवीपी और मोदी सरकार के मंत्रियों ने यह साबित करने का कुत्सित प्रयास किया कि वह दलित नहीं था. अब, जबकि यूपी में बीजेपी की राजनीतिक नांव डूब रही है, उसने फिर से अपने घोषणापत्र में राम मंदिर के मुद्दे को शामिल कर लिया है. हालांकि यह बात एक हद तक सच है कि आजाद भारत की किसी भी सरकार ने शोषित समुदायों की तरफ पर्याप्त ध्यान नहीं दिया है, लेकिन इसके साथ-साथ इस सच्चाई से भी मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि किसी भी सरकार ने इतने खुले तौर पर और इतनी बेशर्मी से उन पर हमला नहीं किया जितना मोदी सरकार ने किया है.

फिरभी, यह समझना एक गलती होगी कि यह सरकार सिर्फ धार्मिक अल्पसंख्यकों और दलितों पर हमला कर रही है. सरकार में आने के तुरंत बाद इसने यूपीए सरकार द्वारा (बीजेपी की मदद से) पास किये गए भूमि अधिग्रहण कानून को बदलने की कोशिश की, ताकि किसानों से उनकी जमीन आसानी से छीनी जा सके और उनकी जमीनों को धनकुबेर पूंजीपतियों और बड़े कॉरपोरेट घरानों को दिया जा सके. मनरेगा के नाम पर खर्च किये जाने पैसे में भी कमी कर दी गई, जिससे ग्रामीण गरीबों को मुश्किल के वक्त में थोड़ी-बहुत आर्थिक मदद हो जाती थी.

500 और 1000 के नोटों की हालिया नोटबंदी ने करोड़ों किसानों और मजदूरों की मेहनत की कमाई को तबाह कर दिया और अपने ही पैसे को निकालने के लिए महीनों तक लंबी कतारों में खड़ा होने को मजबूर कर दिया. आम नागरिकों की रोजमर्रा की जिंदगी पर की गई इस ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ से सिर्फ डिजिटल लेन-देन के कारोबार में लगे बैंकों और दूसरी कंपनियों को ही फायदा पहुंचा है. घरेलु महिलाओं और सेवानिवृत सैनिकों सहित सैकड़ों नागरिकों को नोटबंदी की वजह से अपनी जान गंवानी पड़ी- और सरकार ने इस त्रासदी को स्वीकार करने की जहमत तक नहीं उठाई. असंगठित क्षेत्र के लाखों मजदूरों को अपने काम और जीविका से हाथ धोना पड़ा. किसान अपने खेतों में काम करने वाले खेतिहर मजदूरों को उनका मेहनताना देने में असमर्थ थे और जाड़े की बुआई का मौसम बिना किसी खास उत्पादकता के गुजर गया. बैंक कर्मचारियों की मौतें हुईं और उन्हें अत्यधिक दबाव के बीच बेहद तकलीफदेह काम के घंटे झेलने पड़े. भारत में सारी सरकारें धनकुबेरों के पक्ष में नीतियां बनाती हैं. लेकिन मोदी सरकार इसे एक बड़े आयाम पर ले गई. पूंजीपतियों की सेवा करने के अपने मकसद में मोदी सरकार ने गरीबों को हासिल थोड़ी-बहुत सामाजिक सुरक्षा को भी नष्ट कर दिया.

मोदी सरकार लोकतांत्रिक प्रशासन की तमाम संस्थाओं को कमजोर कर एक निरंकुश और एकाधिकारवादी सत्ता स्थापित करने का निरंतर प्रयास कर रही है. यही बात बाकी सरकारों से इसे अलग करती है. न्यायपालिका से लेकर पुलिस और रिजर्व बैंक तक को इसने पंगु और अपने अधीन करने का अभियान छेड़ रखा है. अपनी पसंद के नेताओं और दलों के चुनाव का अधिकार लोकतंत्र का एक खास पहलू है. लेकिन कई और तौर-तरीकों और संस्थाओं के जरिये लोकतंत्र जारी रहता है. भारतीय लोकतंत्र आजादी से लेकर अब तक का सबसे बड़ा संकट झेल रहा है, क्योंकि इसके चुने हुए प्रतिनिधियों ने ही इसकी नींव ढहानी शुरू कर दी है.

मोदी और उनके संघ परिवार का नफरत से भरी साम्प्रदायिक विचारधारा में यकीन है जो हिंसा और आक्रामकता की वकालत करता है. आरएसएस खुद को राष्ट्रवादी कहता है, लेकिन भारतीय राष्ट्र की इसकी समझ भारतीयों की एक बड़ी आबादी को बेदखल कर देती है, और धनी, भू-स्वामी और उच्चजातीय कुलीनों के फायदे को ध्यान में रखकर यह समझ तय होती है. जब औपनिवेशिक सत्ता से आजादी के लिए भारतीय लड़ रहे थे, आरएसएस अंग्रेजों को उनके फूट डालो राज करो की नीति में मदद कर रहा था. उनके वैचारिक आका सावरकर ने अंग्रेजों को भेजे अपने माफीनामे में इस योजना की पैरोकारी की थी जब वे अंडमान के जेल में बंद थे. भारत का स्वतंत्रता आंदोलन राष्ट्र की एक ऐसी समझ से संचालित था जो सभी भारतीयों और उनके कल्याण की परवाह करता था. भारतीय संविधान ने स्वतंत्रता आंदोलन के इन मूल्यों और पक्षों को कानूनी जामा पहनाने की कोशिश की है.

सभी नागरिकों की स्वतंत्रता और समानता लोकतंत्र की दो मुख्य बातें हैं. सभी लोगों को अपनी पसंद का जीवन जीने और अपने विचारों को अभिव्यक्त करने की पूरी आजादी होनी चाहिए. मोदी सरकार ने लगातार इन आजादियों पर हमला किया है. सरकारी नीतियों के खिलाफ नारे लगाने वाले छात्रों पर इसने राष्ट्रद्रोह का मुकदमा थोप दिया. इस सरकार से जुड़े हुए गुंडों ने कोर्ट के भीतर जेएनयू के छात्रों पर शारीरिक हमला किया. जब कई जाने-माने लेखकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अंधविश्वास-विरोधी कार्यकर्ता डॉ. नरेन्द्र दाभोलकर, मजदूर नेता गोविंद पनसरे और लेखक एम.एम. कलबुर्गी की कट्टरपंथी ताकतों द्वारा खुलेआम हत्या का विरोध किया, तो मोदी सरकार के मंत्रियों ने उसे राष्ट्र-विरोधी करार दिया. असहमत आवाजों को इसने राष्ट्र का दुश्मन करार दिया और सार्वजनिक बहसों को दूषित किया. यह साफ है कि मोदी सरकार डर का एक माहौल निर्मित करना चाहती है, ताकि भारतीय आरएसएस/बीजेपी की भारत के राष्ट्रीय हित की व्याख्या को चुनौती न दे सकें.

भारतीय संविधान के निर्माताओं ने संसदीय शैली के प्रशासन को स्वीकार किया, जिसमें प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाला मंत्रीमंडल जनता द्वारा चुनी हुई संसद के प्रति जवाबदेह है. कई मौकों पर मोदी सरकार ने संसद को ठेंगा दिखा दिया है, और अध्यादेशों के जरिये देश पर शासन करने का प्रयास कर रही है. यहां तक कि राष्ट्रपति ने संसदीय प्रणाली के प्रति इस बेशर्म रवैये को लेकर अपनी नाखुशी जाहिर की है. नरेन्द्र मोदी कभी-कभार ही संसद सत्र में मौजूद होते हैं. संसद में सभी सदस्य बराबर हैं और प्रधानमंत्री को अन्य सदस्यों से वास्ता रखना होता है. शायद मोदी इसी वजह से संसद से डरे रहते हैं.

1975-77 के आपातकाल के दरम्यान की शासन व्यवस्था को छोड़कर किसी भी सरकार ने न्यायपालिका को इतनी बेशर्मी से नियंत्रित करने की कोशिश नहीं की है जितना मौजूदा सरकार कर रही है. सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम द्वारा अनुशंसित जजों की नियुक्ति को इसने लटका रखा है. इसकी जांच एजेंसियों ने इस प्रशासन के समर्थकों के खिलाफ जारी आपराधिक मुकदमों को टालने और राजनीतिक विरोधियों को कष्ट पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. यहां तक कि माननीय सरकारी वकील रोहिणी सालियान ने सार्वजनिक रूप से कहा कि मालेगांव बम धमाके के हिंदू आतंकवादी आरोपियों के खिलाफ जारी मुकदमों में ढीला पड़ने के लिए उन पर दबाव बनाया जा रहा है. 2002 के गुजरात दंगों में हुई हत्याओं को लेकर कुछ महत्वपूर्ण निर्णय देने के चलते जस्टिस ज्योत्सना याग्निक को धमकी भरे फोन आए. उत्तराखंड और अरूणाचल प्रदेश के राज्यपालों ने बीजेपी के राजनीतिक हितों को बेशर्मी से आगे बढ़ाया. पुड्डुचेरी में इनकी उप-राज्यपाल सुपर मुख्यमंत्री की तरह व्यवहार कर रही हैं, वे दिल्ली में बीजेपी की तरफ से मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार भी थीं. जबकि दिल्ली के उप-राज्यपाल ने आम आदमी पार्टी की सरकार को काम करने नहीं दिया है.

अगर बीजेपी यूपी का चुनाव जीतती है तो संघ परिवार के समर्थक आम लोगों पर अपना हमला जारी रखेंगे. अपनी जमीन पर किसानों के अधिकार और लोक-कल्याण पर जनता के अधिकार के खिलाफ मोदी सरकार हमला करती रहेगी. सभी भारतीयों के लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि इसके बाद संघ परिवार समर्थित ताकतें और उत्साह के साथ भारतीय लोकतंत्र को नुकसान पहुंचाने में लग जाएंगी. यूपी में राजनीतिक पार्टियां जनता की धार्मिक एवं जातीय पहचानों और मतदाताओं के तथाकथित राष्ट्रीय हितों के आधार पर वोट की अपील करेंगी. आरएसएस के नेतृत्व वाली मोदी सरकार भारतीय संविधान के सामने एक चेतावनी है. यूपी की जनता के पास इस चुनाव में भारत के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा करने का एक मौका है, जो किसी भी छोटे समूह के हितों से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है.

PEOPLE’S ALLIANCE FOR DEMOCRACY AND SECULARISM (PADS)
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