चूंकि कई बार मांगने पर भी ग्रामीण विकास मंत्रालय ने राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी कानून (नरेगा) मज़दूरी दर के निर्धारण के लिए गठित नागेश सिंह कमिटी की अंतिम अनुशंसाओं को सार्वजनिक नहीं किया है, नरेगा संघर्ष मोर्चा इस कमिटी की ड्राफ़्ट अनुशंसाओं पर ही अपनी टिप्पणी दे रहा है. मोर्चा इन अनुशंसाओं की कड़ी निंदा करता है चूंकि कमिटी के अनुसार नरेगा मजदूरों को न्यूनतम खेतिहर मज़दूरी देने के लिए कोई सम्मोहक तर्क नहीं है. ऐसी राय देकर यह कमिटी 2009 में शुरू हुए न्यूनतम मज़दूरी कानून 1948 के हनन को जारी रख रही है जब सरकार ने नरेगा को न्यूनतम मज़दूरी से अलग कर दिया था.


