30 अगस्त [2015] को साम्प्रदायिकता और अंधश्रद्धा के ख़िलाफ़ एक मुखर आवाज़ को हमेशा के लिये शांत कर दिया गया. धारवाड़ में कन्नड़ भाषा के विद्वान और जनप्रिय लेखक, सतहत्तर वर्षीय प्रोफेसर एम. एम. कलबुर्गी के घर में जा कर हत्यारों ने उनको गोलियों से मौत के घाट उतार दिया. प्रोफेसर कलबुर्गी उदयकालीन कन्नड़ भाषा के वचना साहित्य और उत्तर कर्णाटक में आदिलशाही के दिनों में रचे गये साहित्य की खोजबीन में सक्रिय थे. कई विद्यार्थियों और विद्वानों के लिए प्रोफेसर कलबुर्गी ज्ञान का स्रोत थे. विद्यार्थियों के लिए उनके दरवाज़े हमेशा खुले रहते थे, जिसका फ़ायदा हत्यारों ने उठाया. अपने आप को विद्यार्थी बताते हुए वे उनके घर में घुस गये और अपने नापाक इरादे को अंजाम दिया. प्रोफेसर धार्मिक अंधश्रद्धा के तीव्र आलोचक थे; स्वयं उनकी लिंगायत जाति भी उनके तर्कपूर्ण और मुक्त विचारों को बरदाश्त नहीं कर पाई थी और उन्हें अपनी ही जाति के कट्टरपंथियों के कोप का शिकार बनना पड़ा था. उनको कई बार धमकियाँ मिली थीं और पुलिस की सुरक्षा भी दी गई थी जो उनकी हत्या के कुछ ही दिनों पहले वापस ली गई थी.



