बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद सूरत में हुए दंगों के दौरान सामूहिक बलात्कार को एक अस्त्र के रूप में विधिवत इस्तेमाल किया गया। पर इसमें एक नई बात थी और वह थी इन सामूहिक बलात्कारों के वीडियो टेप बनाना। यह कोई ऐसा मामला नहीं था कि किसी राह चलते ने इन बलात्कारों की फिल्म बना ली हो, बल्कि यह सब बहुत सुनियोजित तरीके से फ्लड लाइट का इस्तेमाल करके किया गया, बावजूद इसके कि उस दौरान आसपास के इलाकों की बिजली कटी हुई थी [1]। प्रफुल्ल बिदवई के अनुसार, 1992 के सूरत दंगों में स्त्रियों के खिलाफ़ हुई भयानक बर्बरता के पीछे मोदी की सोच काम कर रही थी [2]। इन दंगों की बाद की तस्वीरों में मोदी और आडवानी साथ साथ दिखाई पड़ते हैं[3]...।
एक दशक बाद हुए 2002 के गुजरात नरसंहार में सामूहिक बलात्कारों, यौन उत्पीड़न और सामूहिक हत्याओं का भयानक दौर जारी रहा। हिंदू औरतों के साथ हुए यौन उत्पीड़न की झूठी रिपोर्टों का इस्तेमाल मुसलमान औरतों और लड़कियों के खिलाफ़ भयानकतम अपराधों को सही ठहराने के लिए किया गया [4]।कुछ जगहों पर तो हिंदू औरतों ने बलात्कारियों को या तो मसलमान औरतों के साथ बलात्कार के लिए उकसाया अथवा उनका सक्रिय समर्थन किया [5]। इन सबका मोदी ने मुख्यमंत्री तथा गृहमंत्री के रूप में समर्थन किया। उसके अफसरों ने पुलिस को यौन उत्पीड़न में हिस्सेदारी की अनुमति दी और बचे रह गए उत्पीड़ितों के लिए न्याय पाने के सभी रास्ते बंद कर दिए। गुजरात के एक न्यायालय ने तो बिल्किस बानो के सामूहिक बलात्कार और उसके परिवार के चौदह लोगों की हत्या के मामले पर बहस ही बंद कर दी। उसे न्याय तब मिला जब स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने सी बी आई को केस लेने का निर्देश दिया और इस केस को गुजरात के बाहर स्थानांतरित किया गया [6] [. . .].
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